मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबूजी… #AalokNama 😇 #FathersDay
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Dinesh Pandey
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Jun 17, 2025
घर की बुनियादें, दीवारें, बामो-दर थे बाबू जी सबको बाँधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी उनकी ही आवाज़ हमें हर सुबह जगाया करती थी सारे घर का अनुशासन थे, सारा घर थे बाबूजी तीन मुहल्लों में उन जैसी कद काठी का कोई न था अच्छे ख़ासे ऊँचे पूरे क़द्दावर थे बाबू जी भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता अलग अनूठा अनबूझा-सा इक तेवर थे बाबू जी अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है अम्मा जी की सारी सजधज सब ज़ेवर थे बाबू जी कभी बड़ा सा हाथ खर्च थे कभी हथेली की सूजन मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी हर कविता की एक कहानी होती है, इस कविता की कहानी वहाँ से शुरू होती है जहाँ से माँ के गर्भ में हमारा जीवन शुरू होता है. माँ अपने गर्भ में हमें नौ महीने रखती हैं, लेकिन पिता सारी अपने ज़हन में हमें सारी उम्र रखते हैं. पिता ही होते हैं जो जीवन-जगत में अपनी संतान को सबसे नहीं बल्कि ख़ुद से भी आगे देखना चाहते हैं. कभी उन्हें अपनी संतान से हारना भी पड़े तो उस हार में भी वे अपनी जीत महसूस करते हैं. यह जज़्बा सिर्फ़ पिता में होता है. वे पिता ही हैं जिनसे इस जीवन का एक-एक दिन है, फिर उसका कोई एक दिन कैसे हो सकता है ? लेकिन जो मानते हैं उनका भी मान रखना चाहिए... #HappyFathersDay 🥰 Aalok Shrivastav l #babuji #poem #fathersday
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