Sign in to like videos,
subscribe, and earn!


Languages

No language preferences


Interests

No interest preferences


How earnings work →

Got more questions? View FAQs

© 2026 LYKSTAGE

Ashtavakra maha geeta osho ,ओशो अष्टावक्र महागीता ,osho osho

Show more

Deepak Pupneja  verified-tag

0 subscribers

Uploaded to LYKSTAGE


Jul 4, 2026

Ashtvakra mahageeta by osho प्राप्तमेतद् ब्रूहि मम प्रभो।। 1।। अष्टावक्र उवाच। मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान्‌ विषवत्त्यज। क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद् भज।। 2।। न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुद्यौर्न वा भवान्‌। एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्दि मुक्तये।। 3।। यदि देहं पृथक्कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि। अधुनैव सुखी शांतः बंधमुक्तो भविष्यसि।। 4।। न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचरः। असंगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव।। 5।। धर्माऽधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न तो विभो। न कर्ताऽसि न भोक्ताऽसि मुक्त एवासि सर्वदा।। 6।। एक अनूठी यात्रा पर हम निकलते हैं। मनुष्य-जाति के पास बहुत शास्त्र हैं, पर अष्टावक्र-गीता जैसा शास्त्र नहीं। वेद फीके हैं। उपनिषद बहुत धीमी आवाज में बोलते हैं। गीता में भी ऐसा गौरव नहीं; जैसा अष्टावक्र की संहिता में है। कुछ बात ही अनूठी है! सबसे बड़ी बात तो यह है कि न समाज, न राजनीति, न जीवन की किसी और व्यवस्था का कोई प्रभाव अष्टावक्र के वचनों पर है। इतना शुद्ध भावातीत वक्तव्य, समय और काल से अतीत, दूसरा नहीं है। शायद इसीलिए अष्टावक्र की गीता, अष्टावक्र की संहिता का बहुत प्रभाव नहीं पड़ा। कृष्ण की गीता का बहुत प्रभाव पड़ा। पहला कारण: कृष्ण की गीता समन्वय है। सत्य की उतनी चिंता नहीं है जितनी समन्वय की चिंता है। समन्वय का आग्रह इतना गहरा है कि अगर सत्य थोड़ा खो भी जाये तो कृष्ण राजी हैं। कृष्ण की गीता खिचड़ी जैसी है; इसलिए सभी को भाती है, क्योंकि सभी का कुछ न कुछ उसमें मौजूद है। ऐसा कोई संप्रदाय खोजना मुश्किल है जो गीता में अपनी वाणी न खोज ले। ऐसा कोई व्यक्ति खोजना मुश्किल है जो गीता में अपने लिए कोई सहारा न खोज ले। इन सबके लिए अष्टावक्र की गीता बड़ी कठिन होगी। अष्टावक्र समन्वयवादी नहीं हैं--सत्यवादी हैं। सत्य जैसा है वैसा कहा है--बिना किसी लाग-लपेट के। सुनने वाले की चिंता नहीं है। सुनने वाला समझेगा, नहीं समझेगा, इसकी भी चिंता नहीं है। सत्य का ऐसा शुद्धतम वक्तव्य न पहले कहीं हुआ, न फिर बाद में कभी हो सका। कृष्ण की गीता लोगों को प्रिय है, क्योंकि अपना अर्थ निकाल लेना बहुत सुगम है। कृष्ण की गीता काव्यात्मक है: दो और दो पांच भी हो सकते हैं, दो और दो तीन भी हो सकते हैं। अष्टावक्र के साथ कोई खेल संभव नहीं। वहां दो और दो चार ही होते हैं। अष्टावक्र

Read more

Similar videos

Star